बाजार की लड़की की यह सच्ची कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं, बल्कि उन लाखों आवाज़ों की है जो हालात के सामने चुप रह जाती हैं। यह कहानी संघर्ष, मजबूरी और आत्मसम्मान की असली तस्वीर दिखाती है।
कुछ घरों में लड़की को बहू बनाकर नहीं लाया जाता,
उसे एक परीक्षा बनाकर लाया जाता है।
जहाँ हर दिन उससे यही उम्मीद की जाती है कि वह खुद ही हार मान ले।
मीरा भी ऐसे ही एक घर में आई थी,
जहाँ उसकी चुप्पी को उसकी कमज़ोरी समझा जा रहा था।
जब मीरा उस घर की दहलीज़ पर खड़ी थी,
तो न किसी ने फूल बरसाए,
न किसी ने आरती उतारी।
सब कुछ बहुत सामान्य था,
जैसे कोई ज़रूरी काम निपटा लिया गया हो।
शादी से पहले सुनी बातें
अब भी उसके कानों में गूंज रही थीं—
“लड़का तो अच्छा है…”
“पर लड़की?”
“बाज़ार में मिली थी न?”
घूंघट के अंदर मीरा ने आँखें बंद कर ली थीं।
वह जानती थी कि आज से उसकी हर सांस
किसी न किसी सवाल के नीचे ली जाएगी।
मीरा का बचपन कभी आसान नहीं रहा।
छोटा-सा घर,
टूटी अलमारी,
और पिता की झुकी हुई कमर—
यही उसकी दुनिया थी।
उसके पापा सब्ज़ी बेचते थे।
सुबह चार बजे उठकर
मीरा उनके साथ बाज़ार जाती।
तौलना, पैसे गिनना
और ग्राहकों की कड़वी बातें सहना
उसकी रोज़मर्रा की आदत बन चुकी थी।

इसी बाज़ार में एक दिन रोहन आया।
साफ़ कपड़े थे,
पर आँखों में घमंड नहीं था।
बस इतना पूछा—
“आलू ताज़ा हैं?”
फिर रोज़ की मुलाक़ातें होने लगीं।
धीरे-धीरे बातें बढ़ीं।
और मीरा ने पहली बार महसूस किया
कि कोई उसे उसकी गरीबी से नहीं,
उसकी सोच से देख रहा है।
रोहन और मीरा का प्यार
किसी फ़िल्म जैसा नहीं था।
ना गिफ्ट,
ना बड़े वादे।
बस साथ चलना
और एक-दूसरे को समझना।
मीरा ने शुरू में ही रोहन को सच बता दिया था—
“मेरे पापा के पास
तुम्हारे घर को देने के लिए
कुछ भी नहीं है।”
रोहन मुस्कराया था।
“तुम्हारे पापा ने
तुम्हें दिया है,
वो मेरे लिए काफी है।”
मीरा खुश तो हुई,
पर दिल के किसी कोने में डर बैठ गया।
क्योंकि वह जानती थी—
प्यार दो लोगों को जोड़ता है,
पर शादी कई बार परिवारों को तोड़ देती है।
जब रोहन ने घर में बात रखी,
तो सन्नाटा छा गया।
“बाज़ार की लड़की?”
“गरीब?”
“हमारे घर के बराबर?”
मीरा के पापा चुप थे।
उनके पास बोलने को शब्द नहीं थे,
बस भीगी हुई आँखें थीं।
उन्होंने मीरा से कहा—
“बेटी,
अगर तू पीछे हट जाए,
तो मुझे सुकून मिलेगा।”
मीरा रोई नहीं।
उसने सिर झुका लिया।
और शादी हो गई—
बिना खुशी के शोर के।

ससुराल में मीरा का स्वागत
न गुस्से से हुआ,
न अपनापन से।
सासू माँ की आँखों में
बस एक डर था—
कहीं बेटा उनसे दूर न हो जाए।
ननदें साफ़ बोलती थीं—
“भाभी,
हमारे घर में
काम का तरीका अलग है।”
मतलब साफ़ था—
तुम अलग हो।
पहले दिन मीरा ने पूरे मन से खाना बनाया।
ननद ने चखा और कहा—
“नमक ज़्यादा है।”
दूसरे दिन—
“फीका है।”
तीसरे दिन
उसके खाने में जानबूझकर
मिर्च ज़्यादा डाल दी गई।
और सब हँस पड़े—
“इसे कुछ नहीं आता।”

मीरा चुप रही।
धीरे-धीरे उसकी थाली छोटी होने लगी।
कभी कहा गया—
“आज कम बना है।”
कभी—
“बाद में खा लेना।”
कई रातें
उसने सिर्फ़ पानी पीकर काटीं।
हर सुबह चार बजे दरवाज़ा खटखटाया जाता—
“बहू, उठो।”
मीरा रात दो बजे सोती थी।
नींद अधूरी रहती।
आँखें जलतीं।
पर किसी को फर्क नहीं पड़ता।
एक दिन उस पर झूठा इल्ज़ाम लगाया गया—
“पैसे गायब हैं।”
“बहू ने छुपाए होंगे।”
मीरा के हाथ काँप गए।
उसने बस इतना कहा—
“मैंने कुछ नहीं किया।”
जवाब मिला—
“रोना मत करो,
यही सब ड्रामा होता है।”
उस रात
मीरा देर तक आईने में खुद को देखती रही।
उसे लगा—
शायद वो सच में
गलत जगह आ गई है।
मीरा की छोटी बहन पायल सब समझ गई थी।
एक दिन बिना बताए आ गई।
रात को दोनों फर्श पर बैठीं।
मीरा पहली बार
खुलकर रोई—
“मैं थक गई हूँ…
पर पापा को कैसे तोड़ दूँ?”

पायल ने उसे गले लगाया।
“दीदी,
अगर तू टूटी,
तो हम सब टूटेंगे।”
“पर अगर तू खड़ी रही,
तो ये घर झुक जाएगा।”
एक रात मीरा ने
सास और ननदों की बातें सुन लीं—
“इसे ऐसे ही तंग करेंगे।”
“खुद ही तलाक़ माँग लेगी।”
मीरा सुन्न रह गई।
अब उसे समझ आ गया—
ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं था।
ये साज़िश थी।
कुछ दिन बाद
सासू माँ को भयानक इंफेक्शन हो गया।
डॉक्टर ने कहा—
“संक्रमण है,
पास कम लोग रहें।”
ननदों ने साफ़ मना कर दिया।
कमरा अलग कर दिया गया।
खाना बाहर रख दिया जाता।
कोई अंदर नहीं जाता था।
मीरा सब देख रही थी।
और पहली बार
उसने सास में
एक डरती हुई,
अकेली बूढ़ी औरत देखी।
उसने खुद से कहा—
“आज अगर मैं भी डर गई,
तो मैं किस बात की बहू हूँ?”
अगली सुबह
मीरा चार बजे उठी।
पानी उबाला,
दवा निकाली,
और सास के कमरे में चली गई।
सास की आँखें खुलीं।
कमज़ोर आवाज़ आई—
“कौन है?”
“माँ… मैं हूँ।”

मीरा रोज़ उनकी सेवा करती रही।
दिन में, रात में।
बिना शिकायत, बिना सवाल।
एक दिन सासू माँ रो पड़ीं—
“मैंने तुझे बहुत सताया…”
“फिर भी तू…”
मीरा बस बोली—
“आज आप बीमार हैं, माँ।
आज कोई हिसाब नहीं।”
जब सास ठीक हुईं,
ननदों ने सब देख लिया।
मीरा की थकान,
उसकी चुप सेवा,
उसका धैर्य।
उन्हें पहली बार शर्म आई।
एक-एक करके
गलतियाँ याद आने लगीं।
और आँखें भर आईं।
बड़ी ननद बोली—
“भाभी…
हमें लगा था
आप यहाँ टिक नहीं पाएँगी।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
बस उनका हाथ पकड़ लिया।

उस दिन के बाद
घर बदल गया।
मीरा की थाली पहले भरने लगी।
आवाज़ों में सख़्ती नहीं रही।
और सबको समझ आ गया—
जिसे वो कमज़ोर समझ रहे थे,
वही उनके घर की
सबसे मज़बूत दीवार थी।