अगर किसी इंसान को सच-मुच तोड़कर रख देता है, तो वह उसकी असफलता नहीं होती, बल्कि वे ताने होते हैं जो हर दिन, हर पल उसे यह याद दिलाते रहते हैं कि वह “अब तक कुछ नहीं बन पाया।”
नाकामी एक बार आती है, लेकिन ताने रोज़ आते हैं—सुबह की चाय के साथ, शाम की बातचीत में, रिश्तेदारों के फोन में और पड़ोसियों की नज़रों में। आरव भी इन्हीं तानों के बीच बैठा था, जब उस रात उसने महसूस किया कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ एक परीक्षा पास करने की नहीं रही। यह लड़ाई उसके अस्तित्व की थी, उसके आत्मसम्मान की थी, और उस डर की थी जो धीरे-धीरे उसे अंदर से खा रहा था।
घड़ी में रात के 1:52 बज रहे थे। पूरा घर गहरी नींद में डूबा हुआ था। बाहर सन्नाटा था, जैसे पूरी दुनिया रुक गई हो। कमरे के अंदर बस दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक थी, जो हर सेकंड के साथ उसे यह एहसास दिला रही थी कि समय निकलता जा रहा है। मेज़ पर फैली किताबों के पन्ने हल्की हवा में सरसराते थे, मानो वे भी उससे कुछ कहना चाह रहे हों।

आरव अपनी पुरानी, चरमराती कुर्सी पर बैठा था—वही कुर्सी, जिस पर बैठकर उसने सपने भी देखे थे और टूटकर रोया भी था। किताब खुली थी, शब्द सामने थे, लेकिन उसकी नज़र बार-बार दीवार पर टंगे कैलेंडर पर चली जाती थी। उस तारीख़ पर लाल स्याही से एक बड़ा-सा गोला बना था, जैसे कोई उसे चिढ़ा रहा हो। परीक्षा में अब सिर्फ़ इक्कीस दिन बचे थे। वही परीक्षा, जिसके बारे में रिश्तेदार अक्सर कहा करते थे—“ये सबके बस की बात नहीं।” और पिछले साल, पूरी मेहनत के बाद भी, आरव उन्हीं लोगों में शामिल था जो खाली हाथ लौट आए थे।

अगली सुबह वह छत पर गया, शायद खुली हवा में उसे थोड़ा सुकून मिल जाए। सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था कि नीचे से आवाज़ आई—“अरे, शर्मा जी का बेटा तो पहली बार में ही निकल गया!” आरव के कदम वहीं रुक गए। शब्द उसके कानों में नहीं, सीधे दिल में चुभे। उसी पल पड़ोस की मिसेज़ गुप्ता दूसरी बालकनी से उसकी माँ से पूछ रही थीं, “आपका आरव भी तो पढ़ रहा था न? अब क्या कर रहा है?” माँ ने मुस्कराकर बात बदल दी, लेकिन उस मुस्कान में दर्द साफ़ था। आरव समझ गया कि ये सवाल अब सिर्फ़ बाहर की दुनिया तक सीमित नहीं हैं; वे धीरे-धीरे घर की दीवारों के अंदर घुस चुके हैं और हर किसी के मन में अपनी जगह बना चुके हैं।

दोपहर को मामा का फोन आया। शुरुआत में हाल-चाल पूछे गए, फिर बात बिना रुके तुलना पर आ गई—“देखो बेटा, अमित तो पहली बार में निकाल गया। तुम भी कोशिश तो कर रहे हो, पर कभी-कभी समझ लेना चाहिए।” फोन कट गया, लेकिन शब्द आरव के अंदर गूंजते रहे। उसने पानी का गिलास उठाया, मगर हाथ काँप रहा था। “कभी-कभी समझ लेना चाहिए”—क्या समझ लेना चाहिए? कि सपना छोटा कर लो? या खुद को?
शाम को उसकी छोटी बहन अनाया कॉलेज से लौटी। गेट पर ही पड़ोस की एक लड़की ने मासूमियत के नाम पर ज़हर घोलते हुए पूछा, “दीदी, भैया का रिज़ल्ट आया क्या?” अनाया का चेहरा लाल हो गया। उसने गुस्से में कहा, “तुम्हारे घर का कोई रिज़ल्ट पूछने आता है क्या? अपने काम से काम रखो!” आवाज़ ऊँची हो गई, लोग रुककर देखने लगे। अनाया बिना रुके घर के अंदर चली गई, दरवाज़ा बंद किया और फर्श पर बैठ गई। बाहर वह बहादुर थी, लेकिन अंदर वह भी टूट चुकी थी।

आरव कमरे से बाहर आया। अनाया दीवार से सटी बैठी थी, आँखों में आँसू थे जो अब रोके नहीं रुक रहे थे। उसने कुछ नहीं पूछा, बस चुपचाप उसके पास बैठ गया। थोड़ी देर बाद अनाया फूट पड़ी—“सब तुम्हारे पीछे पड़े हैं, भैया। कोई ये नहीं देखता कि तुम रोज़ रात दो बजे तक पढ़ते हो, कि तुम कितनी कोशिश करते हो।” आरव की आवाज़ भारी हो गई—“शायद वो सही हैं, अनाया। शायद मैं ही स्लो हूँ।” अनाया ने उसका हाथ कसकर पकड़ा, जैसे उसे डूबने से बचा रही हो, और बोली—“नहीं। तुम स्लो नहीं हो। तुम बस चुप हो। और चुप लोगों की मेहनत शोर नहीं मचाती।” दोनों रो रहे थे। रसोई से माँ सब देख रही थी, कुछ नहीं बोली। उसकी खामोशी में हज़ार दुआएँ छुपी थीं।

उस रात आरव को नींद नहीं आई। वह उठा और पिता की अलमारी खोली। कपड़ों के नीचे एक पुरानी फाइल मिली, और उसके अंदर एक भूरी रंग की डायरी। पहले पन्ने पर लिखा था—“अगर मेरा बेटा ये पढ़ रहा है…” आरव की उँगलियाँ थरथरा गईं। आगे पिता की अनकही कहानी थी—तीसरे अटेम्प्ट की नाकामी, सुबह चार बजे उठकर खेत में काम करना, फिर पढ़ाई करना, और लोगों के ताने। बीच के पन्नों में लिखावट बदल गई थी, जैसे उम्मीद धीरे-धीरे टूट रही हो। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—“मैं हार नहीं गया था। मैं डर गया था। काश, किसी ने कहा होता—एक बार और।” आरव की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे लगा, पिता सामने खड़े होकर कह रहे हों—जहाँ मैं रुका, तू वहाँ मत रुकना।

अगले दिन आरव ने अपना पुराना टाइमटेबल फाड़ दिया। उसने खुद से कहा कि अब वह किसी को साबित करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को समझने के लिए पढ़ेगा। उसने पुराने प्रश्नपत्र निकाले, हर गलती के आगे “क्यों” लिखा। मोबाइल साइलेंट हो गया, सोशल मीडिया डिलीट। अनाया रोज़ चाय रख जाती, कुछ नहीं पूछती, बस जाते हुए कहती—आज सिर्फ़ तुम्हारे लिए दुआ की।
चौदहवें दिन आरव बेहोश हो गया। डॉक्टर ने कहा—स्ट्रेस है, ब्रेक चाहिए। घर में फिर वही चर्चा शुरू हो गई—इस बार छोड़ देते हैं। रात को अनाया उसके पास बैठी और बोली—“अगर तुम छोड़ना चाहो, तो मैं समझ जाऊँगी। लेकिन अगर वजह लोग हैं, तो मैं तुम्हारे साथ खड़ी हूँ।” आरव की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उनमें डर नहीं था।

परीक्षा हॉल में पहला सवाल वही था, जिससे वह हमेशा डरता था। दिमाग़ में आवाज़ें गूँजने लगीं—“तुमसे नहीं होगा।” तभी उसे पिता की डायरी, अनाया का चेहरा और माँ की खामोशी याद आई। उसने गहरी साँस ली और लिखना शुरू किया—धीरे, पूरे समझ के साथ।
रिज़ल्ट आया। आरव पास हो गया। पड़ोसी बधाई देने आए, रिश्तेदार चुप हो गए। अनाया रो रही थी, लेकिन इस बार खुशी से। आरव ने डायरी में लिखा—“मैं परीक्षा नहीं जीता। मैं डर से आगे निकल गया।” कैलेंडर पर उस लाल गोले के नीचे उसने लिखा—“यहाँ मैं नहीं रुका।